महाराणा कुम्भा का जीवन परिचय | शौर्य, इतिहास, युद्ध और उपलब्धियाँ
महाराणा कुम्भा
🌟 शासक काल 1433 - 1463 ई.
🌟 मेवाड के सिसोदिया कुल से सम्बंधित शासक ।
🌟 पिता - मोकल माता - सौभाग्यवती ( परमार )
🌟 कुम्भा के पिता की हत्या चाचा व मेरा नामक व्यक्तियो ने की थी व मोकल के समय रणमल का हस्तक्षेप मेवाड मे बढ़ जाता है व रणमल मण्डोर शासक था।
कुम्भा शासक बनते ही अपने तीन लक्ष्य निर्धारित करता है -
(i) चाचा व मेरा से अपने पिता की हत्या का बदला लेना ।
(ii) रणमल के हस्तक्षेप को मेवाड से मिटाना ।
(iii) मेवाड़ का साम्राज्य विस्तार ।
🌟 कुम्भा ने चाचा व मेरा की हत्या रणमल द्वारा कोटड़ा के जंगलो मे करवा देता है ।
🌟 कुम्भा रणमल की हत्या इसी की दासी भारमली से जहर दिलवा कर देता है । ( 1438 )
🌟 रणमल की हत्या मेवाड़ मे हो जाने से कुम्भा मण्डोर पर अपना अधिकार कर लेता है । लेकिन रणमल का पुत्र रावजोधा 1453 ई. मे लोक देवता हड़बूजी की सहायता से मेवाड़ की सेनाओ को पराजीत कर मण्डोर पर अपना अधिकार कर लेता है ।
🌟 कुम्भा के क्रोधित होने पर रावजोधा अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से कर देता है ।
🌟 श्रृंगार देवी ने चितौड मे घोसुण्डी जी की बावड़ी का निर्माण करवाया था ।
🌟 हंसाबाई के प्रयासो से मेवाड़ शासक कुम्भा व मारवाड़ राजजोधाके बीच 1453 ई . मे आँवल - बावल या आँवल - खेजड़ी की संधि हुई थी।
🌟ये संधि कुम्भा व रावजोधा के बीच हुई । संधि के तहत जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से करवाया था ।
साम्राज्य विस्तार : -
🌟 कुम्भा ने 1433 ई . सिरोही के चौहान शासक सहसमल को पराजित किया था व सिरोही पर अपना अधिकार जमा लिया था ।
🌟 कुम्भा ने अचलगढ़ दुर्ग का पुनः निर्माण करवाया व अचलगढ़ दुर्ग मे कुम्भा की पीतल की प्रतिमा है ।
🌟 1437 ई. मे कुम्भा जहाजपुर के युद्ध मे बूँदी शासक बेरिसाल को पराजित करता है।
🌟 सारंगपुर का युद्ध 1437 ई. मे मेवाड व मालवा के बीच
🌟 कुम्भा व मोहम्मद खिलजी 1 के बीच
🌟 इस युद्ध मेकुंभ की विजय हुआ था
🌟कुंभा ने सारंगपुर या मालवा विजय के उपलक्ष में चित्तौड़गढ़ के किले में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया
🌟विजय स्तंभ का निर्माण कुंभा द्वारा 1440 ई से 1448 ईस्वी में इसका वास्तुकार देता था वह 9 मंजिल 122 फीट ऊंचाई और 157 सीढ़ियां हैं ।
🌟विष्णु को समर्पित वह इसलिए इसे विष्णुगढ़ ध्वज कहते हैं इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में अल्लाह का नाम लिखा गया है ।
🌟कर्नल टॉड ने विजय स्तंभ को कुतुब मीनार से श्रेष्ठ बताया है
🌟इतिहासकार गर्जट ने इसे मूर्तियों का अजाब कर कहा ह ।
🌟इतिहासकार फिंगर्सन ने इसकी तुलना रूम की टार्जन से कि
🌟 विजय स्तंभ में प्राचीन हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं इसलिए विजय स्तंभ को प्राचीन ह हिंदू मूर्तियों का विश्व कोष कहते हैं
🌟कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति संस्कृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में विजय स्तंभ पर लिखी गई है जिसके लेखक अत्री वह महेश है
🌟 मेवाड शासक स्वरूप सिंह ने विजय स्तम्भ का पुनः निर्माण करवाया था ।
🌟 राज. का पहला विजय स्तम्भ बयाना भरतपुर में समुद्रगुप्त ने बनाया था।
🌟 कुम्भा ने नागोंर से फिरोज खाँ की मृत्यु के बाद मुजाहिद खाँ की जगह शम्स खाँ को नागौर का शासक बनाया था ।
🌟 शम्स खाँ कुछ समय पश्चात कुम्भा के विरुद्ध गुजरात कुतबुदिन शाह से सहायता मांगता है ।
चम्पानेर की संधि : - 1456 ई.
🌟 मालवा शासक महमूद खिलजी - I व गुजरात शासक कुतुबुदिन शाह के बीच ।
🌟यह संधि मेवाड़ रियासत वह महाराणा कुंभा के विरुद्ध हुई थी
🌟कुंभा ने कुंभलगढ़ के मैदान में कुतुबुद्दीन शाह को वह 1457 में बदनोर के युद्ध में महमूद खिलजी को पराजित किया था
🌟कुंभा ने इस उपलब्धि में बदनोर में कुशाला माता के मंदिर का निर्माण करवाया था
🌟 कुम्भा का अन्य पक्ष :- कुम्भा का काल राज. के इतिहास मे स्थापत्य कला का स्वर्णकाल कहलाता है । कुम्भा को राज. मे स्थापत्य कला का जनक कहते है ।
🌟 श्यामलदास के ग्रंथ वीर - विनोद के अनुसार 84 दुर्ग
मे से 32 दुर्गो का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था ।
कुम्भा की उपाधियाँ :-
👉हिन्दु सुरताण - हिन्दु राजाओ का राजा
👉 अभिनव भरताचार्य - संगीत के क्षेत्र मे
👉 हालगुरु - पहाड़ी दुर्गो का स्वामी
👉 राणारासो - साहित्यकारो का आश्रयदाता
🌟 बाबर ने बाबरनामा मे कुम्भा को राज. का कृष्णदेव राय कहा
🌟 अन्य उपाधि - राजगुरु
दानगुरु
छापगुरु
रामरायण
चापगुरु
🌟 कुम्भा वीणा वाद्य यंत्र बजाता था ।
🌟 कुम्भा के संगीत गुरु :- सांरगधर व्यास
🌟 कुम्भा के मुख्य गुरु :- हिरानन्द
🌟 कुम्भा की संगीतकज्ञ पुत्री रमाबाई थी जिसे साहित्यो मे वागीश्वरी कहा गया ।
🌟 कुम्भा ने रमा बाई के विवाह के उपलक्ष मे चितौड के किले मे श्रृंगार चकरी के मन्दिर का निर्माण करवाया था । जो कि एक जैन मन्दिर है ।
🌟 रमाबाई ने रमा मन्दिर का निर्माण योगिनी पट्टनम ' जवार ( सलूम्बर ) मे करवाया था ।
कुम्भा के दरबारी :-
👉 कान्हव्यस :- एकलिंग महात्म्य ग्रंथ इसका प्रथम अध्याय स्वंय कुम्भा ने लिखा था राजवर्णन के नाम से
👉 नाथा :- वास्तु मन्झरी
👉 कवि महेस : - तीर्थ माला ( 120तीर्थो का वर्णन )
👉 गोविन्द :- द्वारदीपिका ' उद्वाररोहिणी . ' कलानिधि '
👉 मंडन :- गुजरात निवासी वास्तुकार था ।
👉 राजवल्लभ : - आवासीय घर , नगर , महल ' दुर्ग निर्माण की जानकारी
👉 रूपमंडन :- मूर्ति निर्माण कला से सम्बन्धित
👉 प्रसादमंडन :- मन्दिर निर्माण कला से सम्बन्धित
👉 रूपावतार / देवमूर्ति प्रकरण : - मूर्ति स्थापना से सम्बन्धित
👉 वास्तु मण्डन : - वास्तु शास्त्र के नियम
👉 कोदण्डमण्डन :- धनुर्विधा से सम्बंधित
👉वेद मंडन - बीमारियो के उपचार से संबंधित
👉 शकुन मंडन :-
👉 कुम्भा के दरबार मे पुराणवायक :- आशानन्द थे
अन्य दरबारी :-
:- सुन्दर सुरी , सोम देव , जयसोम
कुम्भा की रचनाएँ :-
📝संगीतराज (पांच भाग )
📝संगीत मिमांसा
📝संगीत रत्नाकार टीका
📝संगीत क्रम दीपिका
📝सुधा प्रबन्ध ( सुड प्रबन्ध )
📝कामराज रतिसार ( सात भाग )
📝हरिवार्तिक
📝चण्डीशतक पर टीका
📝रसिक प्रिया : - जयदेव की रचना गीतगोविन्द पर लिखी
📝संगीत सुधा
कीर्ति स्तम्भ ( चितौड़ ) :-
📝कुम्भा के शासन काल मे जैन जीजाशाह मे निर्माण करवाया था ।
📝7वी मंजिल 75 फीट ऊँचाई ।
📝ये प्रथम तीर्थकर आदिनाथ या ऋषभदेव समप्रित है ।
मचान दुर्ग :-
📖कुम्भा ने इसका निर्माण मेरो का आक्रमण को रोकने के लिए करवाया था
कुम्भलगढ़ ( राजसमंद ) :
👉कुम्भा ने इसका निर्माण पन्नाधाय व कुम्भलदे की याद मे करवाया इसका वस्तुकार मंडन था । इस दुर्ग का परकोटा 36 km का था ।
👉कर्नल टॉड ने इस दुर्ग की तुलना एन्ट्रक्सन से की है ।
👉इस दुर्ग को मेवाड की आँख मेवाड की संकटकालीन राजधानी कहते है।
👉अबुल फजल ने लिखा इतना ऊँचा की देखने पर सिर की पगड़ी नीचे गीर जाती है।
रणकपुर जैन मंदिर (पाली) :-
🌟मथाई नदी के किनारे स्थित ।
🌟कुम्भा के समय धरणकशाह ने निर्माण करवाया
🌟आदिनाथ / ऋषभदेव को समर्पित ।
🌟1444 खम्भे इसे खम्भो का अजायबघर कहते है।
🌟इस मन्दिर को चौमुखा मन्दिर , त्रिभुवन विहार मन्दिर, व त्रिलोक्य दीपक मंदिर कहते है।
🌟इसका वास्तुकार देपाक था।
मृत्यु : -
👉1468 ई कुम्भा की हत्या पुत्र ऊदा द्वारा कुम्भलगढ़ दुर्ग में मामादेव कुण्ड के पास की गई
👉ऊदा को मेवाड का पितृहत्ता कहते है